जमानियां। नगर कस्बा बाजार स्थित शाही जामा मस्जिद में शुक्रवार ( जुमा) के दिन पैगम्बर मोहम्मद साहब की जीवनी और हलीमा सादिया दाई द्वारा परवरिश में बयान फरमाया। उन्होंने बताया कि हलीमा सादिया (बीबी हलीमा) ने पैगंबर मोहम्मद साहब की पालक-माँ के रूप में किया। शुरुआती बचपन में अत्यंत प्रेम, स्नेह और देखभाल के साथ परवरिश की थी। हलीमा सादिया एक गरीब परिवार से थीं। जब मक्का की अन्य अमीर दाइयों ने यतीम (अनाथ) मोहम्मद साहब को लेने से मना कर दिया था। तब हलीमा ने उन्हें अपनी गोद लिया। मौलाना तनवीर रजा ने अपने तकरीर में बताया कि मोहम्मद साहब को अपनाने के बाद हलीमा के घर में आर्थिक तंगी दूर हो गई। उनकी कमज़ोर ऊँटनी तेज़ चलने लगी और उनकी बकरियों को भरपूर दूध मिलने लगा। हलीमा ने उन्हें अपने कबीले (बनी साद) के खुले वातावरण में रखा और कुछ वर्षों तक अपने ही बच्चे की तरह उनका लालन-पालन किया। जिसके बाद उन्हें उनकी वालिदा (माता) बीबी आमिना को सौंप दिया गया। उन्होंने कहा कि इस्लाम के पैगंबर हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की पालक-माँ (दूध पिलाने वाली माँ) थीं। जिन्होंने रेगिस्तान के खुले और स्वस्थ वातावरण में उनका पालन-पोषण किया था। हलीमा सादिया मक्का के गरीब घराने से थीं। जब वे अन्य दाइयों के साथ मक्का आईं। तो अमीर बच्चों के न मिलने पर उन्होंने यतीम मोहम्मद साहब को अपनी गोद में लिया। रजा ने बताया मोहम्मद साहब के आने से हलीमा के घर में बरकत (समृद्धि) शुरू हो गई। उनकी कमजोर ऊँटनी तेज चलने लगी और सूखी बकरियों के थन दूध से भर गए। हलीमा ने उन्हें अपने कबीले (बनी साद) के शांत और स्वच्छ ग्रामीण माहौल में रखा। जो बच्चों के शारीरिक और भाषाई विकास के लिए बहुत अच्छा माना जाता था। देखभाल और अपनापन दिया। उन्होंने अपने सगे बच्चों की तरह मोहम्मद साहब को दूध पिलाया और उनका ख्याल रखा। लगभग दो से पांच वर्ष की आयु तक वह उनके पास रहे। जिसके बाद उन्हें उनकी वालिदा (माता) हजरत आमिना को सौंप दिया गया।