गाज़ीपुर। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी हर घर जल योजना (जल जीवन मिशन) का उद्देश्य था कि प्रत्येक ग्रामीण परिवार तक सुरक्षित और स्वच्छ पेयजल नल के माध्यम से पहुंचे। इस योजना को ग्रामीण भारत की सबसे बड़ी बुनियादी सुविधाओं में से एक माना गया, जिस पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए। लेकिन गाज़ीपुर जनपद की ग्राम पंचायत छावनी लाइन के राजस्व गांव सरैया और तुलसीपुर से जो तस्वीर सामने आ रही है, वह योजना के क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है।

यूनाइटेड मीडिया ने अधिशासी अभियंता जल निगम के माध्यम से जिलाधिकारी गाज़ीपुर को सौंपे गए ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि दोनों गांवों में पाइपलाइन बिछाने का कार्य कई वर्षों पहले पूरा कर दिया गया था, लगभग चार से पांच वर्ष बीत जाने के बाद भी ग्रामीणों के घरों तक नल से पानी नहीं पहुंच पाया है। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि करोड़ों रुपये की सार्वजनिक परियोजना की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़ा करता है।

ग्रामीणों का कहना है कि पाइपलाइनें तो बिछा दी गईं, लेकिन वे आज तक उपयोग में नहीं आ सकीं। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब निर्माण कार्य पूरा हो गया था, तो जलापूर्ति शुरू क्यों नहीं हुई? क्या तकनीकी बाधाएं थीं? क्या परियोजना अधूरी छोड़ी गई? क्या ठेकेदार ने कार्य मानकों के अनुरूप पूरा नहीं किया? या फिर विभागीय समन्वय की कमी इसका कारण बनी? इन सभी बिंदुओं की निष्पक्ष जांच आवश्यक प्रतीत होती है।

जल जीवन मिशन का उद्देश्य केवल पाइपलाइन बिछाना नहीं, बल्कि प्रत्येक घर तक नियमित और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना है। यदि वर्षों बाद भी नलों से पानी नहीं आ रहा है, तो योजना का वास्तविक लाभ ग्रामीणों तक नहीं पहुंचा। इससे यह भी प्रश्न उठता है कि क्या संबंधित विभागों द्वारा कार्य की गुणवत्ता और परियोजना की प्रगति की नियमित निगरानी की गई थी?

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल केवल सुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। जलापूर्ति न होने के कारण लोगों को हैंडपंप, कुओं या अन्य पारंपरिक स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिनका पानी कई बार सुरक्षित नहीं होता। इससे जलजनित रोगों का खतरा बढ़ सकता है और महिलाओं एवं बच्चों को पानी लाने में अतिरिक्त समय और श्रम देना पड़ता है।

ज्ञापन में यह भी मांग की गई है कि जलापूर्ति शुरू न होने के वास्तविक कारणों की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा यदि किसी कार्यदायी संस्था, अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है तो उसके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो, इसके लिए प्रभावी निगरानी व्यवस्था विकसित की जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सरकारी योजना की सफलता केवल बजट खर्च करने से नहीं, बल्कि अंतिम लाभार्थी तक उसका लाभ पहुंचने से मापी जाती है। यदि पाइपलाइन बिछाने के वर्षों बाद भी पानी नहीं पहुंच रहा है, तो यह योजना के उद्देश्य और परिणाम के बीच गंभीर अंतर को दर्शाता है।

इस मामले में प्रशासन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि जिला प्रशासन त्वरित जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करता है, तो इससे न केवल ग्रामीणों का विश्वास बढ़ेगा बल्कि अन्य विकास परियोजनाओं के लिए भी जवाबदेही का संदेश जाएगा। दूसरी ओर यदि शिकायतों की अनदेखी होती है, तो इससे लोगों का सरकारी योजनाओं पर भरोसा कमजोर पड़ सकता है।

यूनाइटेड मीडिया के जिलाध्यक्ष आशीष गुप्ता द्वारा जिलाधिकारी को दिए गए ज्ञापन में स्पष्ट रूप से मांग की गई है कि ग्राम पंचायत छावनी लाइन के राजस्व गांव सरैया एवं तुलसीपुर में तत्काल नल के माध्यम से जलापूर्ति शुरू कराई जाए, जांच कराई जाए तथा दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि—

जब पाइपलाइन बिछाने का कार्य पूरा हुआ, तो जलापूर्ति अब तक क्यों शुरू नहीं हुई?

क्या संबंधित विभाग ने कार्य पूर्ण होने के बाद परीक्षण और संचालन की प्रक्रिया पूरी की थी?

क्या परियोजना तकनीकी कारणों से रुकी हुई है या प्रशासनिक लापरवाही इसका कारण है?

क्या कार्यदायी संस्था को भुगतान कार्य पूर्ण होने के बाद किया गया? यदि हां, तो बिना जलापूर्ति शुरू हुए भुगतान कैसे हुआ?

क्या इस परियोजना का सामाजिक एवं तकनीकी ऑडिट कराया गया?

क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?

इन प्रश्नों का उत्तर केवल ग्रामीण ही नहीं, बल्कि पूरा जनपद जानना चाहता है। हर घर जल योजना का उद्देश्य हर परिवार तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाना था, इसलिए यदि किसी गांव में वर्षों बाद भी नल सूखे हैं, तो यह केवल स्थानीय समस्या नहीं बल्कि शासन की विकास योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है।

अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं। यदि शिकायत सही पाई जाती है तो अपेक्षा की जाएगी कि शीघ्र जलापूर्ति प्रारंभ कराई जाए, जिम्मेदार अधिकारियों और कार्यदायी संस्था की जवाबदेही तय हो तथा भविष्य में ऐसी लापरवाही रोकने के लिए सुदृढ़ निगरानी तंत्र विकसित किया जाए। वहीं यदि जांच में अलग तथ्य सामने आते हैं, तो उन्हें भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि ग्रामीणों को वास्तविक स्थिति की जानकारी मिल सके।

सरैया और तुलसीपुर के ग्रामीणों की मांग सरल है—पाइपलाइन नहीं, पानी चाहिए। विकास योजनाओं की सफलता का वास्तविक पैमाना उद्घाटन, शिलान्यास या निर्माण कार्य नहीं, बल्कि अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने वाला लाभ है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस जनहित के मुद्दे पर कितनी तत्परता और पारदर्शिता के साथ कार्रवाई करता है।