साहित्य चेतना समाज के कजरी गायन कार्यक्रम में कलाकारों ने बांधा समां, श्रोताओं ने तालियों से बढ़ाया उत्साह

गाजीपुर। सावन की फुहारों और लोक संस्कृति की मिठास के बीच नगर के गोलाघाट स्थित बाबा जागेश्वरनाथ मंदिर के सभागार में साहित्य चेतना समाज के महिला प्रकोष्ठ के तत्वावधान में भव्य कजरी गायन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कजरी के पारंपरिक सुरों ने ऐसा समां बांधा कि पूरा सभागार लोकगीतों की मधुर धुनों से गूंज उठा। कलाकारों की प्रस्तुतियों पर श्रोताओं ने जमकर तालियां बजाकर उनका उत्साहवर्धन किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ बी.एस.डी. पब्लिक स्कूल रेवतीपुर की छात्राओं खुशी चौधरी, यशस्विनी पाण्डेय एवं आर्या राय द्वारा प्रस्तुत मनोहारी शिव वंदना से हुआ। कार्यक्रम संयोजक संगीता त्रिपाठी एवं रागिनी त्रिपाठी ने उपस्थित कलाकारों एवं श्रोताओं का स्वागत किया।

संस्था के संस्थापक अमरनाथ तिवारी ‘अमर’ ने कजरी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कजरी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान और लोक परंपरा की जीवंत धरोहर है। पूर्वांचल में कजरी गायन का विशेष महत्व है और लोकगीतों एवं पारंपरिक गीतों के माध्यम से हमारी समृद्ध लोक संस्कृति पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है।

उन्होंने कहा कि आधुनिकता के दौर में नई पीढ़ी पाश्चात्य संगीत की ओर आकर्षित हो रही है। ऐसे समय में लोकगीत और लोक संगीत को जीवंत बनाए रखना बेहद जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी माटी, संस्कृति और जड़ों से जुड़ी रहें। इसी उद्देश्य से साहित्य चेतना समाज द्वारा प्रतिवर्ष कजरी गायन कार्यक्रम आयोजित किया जाता है।

कजरी के सुरों पर झूमे श्रोता

कार्यक्रम में आए कलाकारों ने एक से बढ़कर एक कजरी प्रस्तुत कर श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। सुप्रसिद्ध लोक गायिका शाम्भवी उपाध्याय ने ‘कइसे खेले जइबू सावन में कजरिया, बदरिया घिर आइल सजनी’ तथा ‘अरे रामा भिंगेले मोरी चुनरिया, बदरिया बरसे रे हरि’ सुनाकर खूब वाहवाही बटोरी।

राजूजी मौर्य ने ‘श्याम नहीं घर आये, पानी बरसन लागे ना’ प्रस्तुत कर श्रोताओं की खूब तालियां बटोरीं। वहीं वर्तिका पाण्डेय ने ‘हरे रामा कृष्ण बने मनीहारी, पहिन के सारी ना’ और राजेश निराला ने ‘सखिया सावन बहुत लुभावन’ सुनाकर माहौल को कजरी के रंग में रंग दिया।

अंकित आर्या ने ‘छोटकी ननदी के बात ना सहाई, हो जाई लड़ाई पिया ना’ प्रस्तुत कर अपने सुर, लय और ताल से श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया।

इसी क्रम में राजन तिवारी ने ‘पिया मेंहदी लिया दा मोतीझील से, जाके साईकिल से ना’ और अनीता यादव ने ‘गये मथुरा से श्याम नहीं आये, जीया घबराये सखी ना’ प्रस्तुत कर खूब प्रशंसा अर्जित की।

राकेश शर्मा ने ‘झूला पड़ गईलें अमवा की डाल पर’ तथा गायत्री साहू ने ‘झूला झूले महादेव’ सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके अतिरिक्त संजू पाण्डेय, चिन्ता यादव एवं नीतू यादव की प्रस्तुतियां भी सराहनीय रहीं।

पूरे कार्यक्रम के दौरान कलाकारों के सुरों के साथ श्रोताओं की करतल ध्वनि गूंजती रही। सावन की कजरी ने आयोजन को लोक संस्कृति, संगीत और परंपरा के अनूठे संगम में बदल दिया।

कार्यक्रम में संस्था के सचिव हीरा राम गुप्त, संगठन सचिव प्रभाकर त्रिपाठी, डाॅ. संतोष सिंह, डाॅ. संजय राय, डाॅ. रामनारायण तिवारी, साक्षी सक्सेना, अरुण कुमार तिवारी, संतोष तिवारी, आनन्द प्रकाश अग्रवाल, आनन्द तिवारी, कल्पना, नीलम श्रीवास्तव, रिंकू सिंह, डाॅ. विनीता राय, पूजा श्रीवास्तव, विद्यानिवास पाण्डेय, अर्चना राय सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का संचालन संस्था के संस्थापक अमरनाथ तिवारी ‘अमर’ ने किया, जबकि शैलेन्द्र तिवारी ने सभी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।

कजरी के मधुर सुरों से सजी यह शाम एक बार फिर यह संदेश दे गई कि लोकगीत केवल गीत नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति की वह विरासत हैं, जिन्हें संजोना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।